Mirzapur The Movie Review: भौकाल तो है, लेकिन क्या फिल्म दिल जीत पाती है?

Mirzapur The Movie Review: सच कहूं तो मिर्जापुर देखने से पहले मेरे मन में एक ही सवाल था—क्या Mirzapur का वही पुराना भौकाल बड़े पर्दे पर भी देखने को मिलेगा, या फिर यह सिर्फ पुराने फैंस की nostalgia वाली सवारी बनकर रह जाएगी?

4 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में पहुंची यह फिल्म मिर्जापुर की उसी दुनिया को बड़े पर्दे पर लेकर आती है, जिसे दर्शक तीन सीजन से देखते आ रहे हैं। पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु शर्मा, जितेंद्र कुमार, रवि किशन और फ्रेंचाइजी के कई जाने-पहचाने चेहरे इसमें नजर आते हैं। फिल्म का निर्देशन गुरमीत सिंह ने किया है।

फिल्म देखने के बाद मेरी राय थोड़ी मिली-जुली है। Mirzapur The Movie में वो सारे एलेमिन्ट्स हैं जिनके लिए फैंस इस फ्रेंचाइजी को पसंद करते हैं, लेकिन हर जगह फिल्म उतनी तेज और टाइट नहीं रहती जितनी मैं उम्मीद कर रहा था। मूवी शुरू होते ही महसूस हो जाता है कि मिर्जापुर वापस आ गया है। मूवी का माहौल शुरू से ही आपको उसी मिर्जापुर वाली दुनिया में वापस ले जाने की कोशिश करता है।

देसी अंदाज, खतरनाक किरदार, सत्ता की लड़ाई और बातचीत के बीच छिपी धमकी—ये चीजें फिल्म में लगातार देखने को मिलती हैं। खास बात यह है कि बड़े पर्दे पर इन किरदारों को देखना अपने आप में एक अलग एक्सपीरियंस देता है। मैंने मूवी देखते हुए कई जगह महसूस किया कि अगर आपने मिर्जापुर को पहले से देखा हुआ है तो आप सीन्स को सिर्फ देख नहीं रहे होते, बल्कि किरदारों के साथ अपना पुराना कनेक्शन भी महसूस करते हैं।

Pankaj Tripathi को देखकर लगा कि कालीन भैया की कमी सच में थी

मेरे लिए फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा कालीन भैया ही रहे। पंकज त्रिपाठी जब स्क्रीन पर आते हैं तो ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। उनकी आवाज, चेहरे के एक्सप्रेशन्स और बात करने का तरीका ही सीन्स का माहौल बदल देता है। मिर्जापुर की दुनिया में उनका किरदार हमेशा दूसरों से कुछ कदम आगे सोचता हुआ दिखाई देता है और फिल्म में भी यही बात देखने को मिलती है।

फिल्म देखने के बाद मुझे सबसे ज्यादा यही लगा कि अगर कालीन भैया वाला करैक्टर कमजोर पड़ जाता, तो शायद इसका असर पूरी मूवी पर भी पड़ता। लेकिन यहां पंकज त्रिपाठी ने एक बार फिर अपना काम बखूबी किया है।

Munna Bhaiya की वापसी पर थिएटर में अलग ही माहौल

अब बात करते हैं उस किरदार की जिसका इंतजार शायद सबसे ज्यादा था। दिव्येंदु यानी मुन्ना भैया की वापसी फिल्म के सबसे चर्चित हिस्सों में से एक है। जब उनका किरदार स्क्रीन पर आता है तो साफ महसूस होता है कि दर्शकों को इस करैक्टर से कितना लगाव है।

मुझे पर्सनली मुन्ना का अंदाज इसलिए अच्छा लगा क्योंकि किरदार में वही पुरानी एनर्जी और अनप्रिडिक्टेबलिटी दिखाई देती है। सोशल मीडिया पर भी रिलीस के बाद  मुन्ना भैया की वापसी को लेकर काफी पॉजिटिव रिएक्शन देखने को मिले है।

Ali Fazal यानी Guddu अब पहले जैसा नहीं रहा

अली फजल यानी गुड्डू पंडित भी अब काफी बदल चुके है। पहले वाला गुस्सा और बदले की आग तो है ही, लेकिन अब किरदार के अंदर सत्ता का असर भी दिखाई देता है। अली फजल ने बॉडी लैंग्वेज और एक्सप्रेशन्स से इस बदलाव को अच्छी तरह दिखाया है। मुझे फिल्म में उनका अग्रेसिव अंदाज अच्छा लगा। खासकर जब गुड्डू दूसरे किरदारों के सामने खड़ा होता है, तो वह सिर्फ एक पुराना करैक्टर नहीं लगता, बल्कि अपनी अलग पावर के साथ दिखाई देता है।

Ravi Kishan का किरदार फिल्म में क्या करता है?

रवि किशन फिल्म में बब्बन बाबुआ के किरदार में दिखाई देते हैं और मेरे हिसाब से उन्होंने फिल्म में अच्छी एनर्जी जोड़ी है। उनका अंदाज बाकी पुराने किरदारों से अलग है और इसी वजह से जब वह कहानी में आते हैं तो थोड़ा नया फ्लेवर महसूस होता है। शुरुआती सोशल मीडिया रिएक्शन्स में भी रवि किशन की एंट्री और उनके करैक्टर को लेकर काफी चर्चा हुई है।

Action और dialogues में अभी भी वही Mirzapur वाला मजा है

अगर आपने मिर्जापुर इसलिए पसंद की थी क्योंकि उसमें एक्शन के साथ दमदार डायलॉग और देसी अंदाज मिलता था, तो फिल्म आपको यहां निराश नहीं करेगी। बड़े पर्दे पर एक्टिन्स सीन्स का स्केल बढ़ा हुआ महसूस होता है। लेकिन मेरे लिए ये मूवी सिर्फ एक्शन की वजह से अच्छी नहीं बनी। असली मजा तब आता है जब पुराने किरदार आपस में टकराते हैं।

लेकिन यहां मूवी थोड़ी लंबी हो जाती है

अब आते हैं उस चीज पर जो मुझे सबसे ज्यादा खली वो है मूवी की लेंथ। मिर्जापुर द मूवी का का फाइनल रन टाइम 3 घंटे 17 मिनट है और फिल्म को A सर्टिफिकेट मिला है। इतनी लंबी फिल्म अगर शुरू से आखिर तक लगातार पकड़ बनाए रखे तो कोई परेशानी नहीं है। लेकिन यहां कुछ हिस्सों में मुझे लगा कि कहानी को थोड़ा जल्दी आगे बढ़ाया जा सकता था। कुछ सीन्स में ऐसा महसूस होता है कि चीजों को जरूरत से ज्यादा समझाया जा रहा है। यही शिकायत कुछ दर्शकों की सोशल मीडिया रिएक्शन्स में भी देखने को मिली है। मेरे हिसाब से अगर फिल्म अगर थोड़ी टाइट होती तो इसका इम्पेक्ट और ज्यादा जोरदार हो सकता था।

क्या फिल्म में कहानी नई लगती है?

यहां मैं बहुत ज्यादा उम्मीद लेकर नहीं गया था और शायद यही सही भी रहा। मिर्जापुर द मूवी कोई ऐसी कहानी नहीं पेश करती जिसे देखकर आप कहें कि फ्रेंचाइजी ने बिल्कुल नया रास्ता पकड़ लिया है। मूवी की असली ताकत उसके करैक्टर्स और उनके बीच की पावर गेम है। कालीन भैया, गुड्डू, मुन्ना और बाकी किरदारों को एक साथ बड़े पर्दे पर देखना ही इस मूवी का सबसे बड़ा अट्रैक्शन है।

इसलिए अगर आप मिर्जापुर के पुराने फैन हैं तो कहानी की फेमिलिर्टी आपको परेशान नहीं करेगी। लेकिन अगर आप फ्रेंचाइजी से पहली बार जुड़ रहे हैं, तो एक्सपीरियंस थोड़ा अलग हो सकता है।

Public Reaction कैसा है?

फिल्म रिलीज होने के बाद शुरुआती पब्लिक रिएक्शन काफी हद तक पॉजिटिव ही दिखाई दिए है। X पर कई दर्शकों ने एक्शन, डायलॉग बैकराउंड स्कोर और पुराने किरदारों की वापसी की तारीफ करी है। खासकर मुन्ना भैया और रवि किशन को लेकर काफी चर्चा देखने को मिली। हालांकि सभी लोग एक जैसी राय नहीं रखते हैं। कुछ दर्शकों को फिल्म की पेसिंग और लंबाई परेशान कर रही है और उन्हें लगा कि कुछ हिस्सों को छोटा किया जा सकता था।

क्या Mirzapur The Movie देखनी चाहिए?

अगर आपने मिर्जापुर के तीनों सीजन देखे हैं और आपको कालीन भैया, गुड्डू और मुन्ना जैसे किरदार पसंद हैं, तो मेरे हिसाब से फिल्म एक बार थिएटर में जरूर देख सकते हैं। बड़े पर्दे पर इन करैक्टर को देखने का अपना अलग ही मजा है। लेकिन अगर आपने मिर्जापुर कभी नहीं देखी, तो मैं सीधे फिल्म देखने की बजाय पहले सीरीज देखने की सलाह दूंगा। इस फ्रेंचाइजी के किरदारों की हिस्ट्री और उनके रिलेशनशिप को जानना फिल्म के एक्सपीरियंस को काफी बेहतर बना सकता है।

Mirzapur The Movie Review: मेरा Final Verdict

अगर मुझे एक लाइन में कहना हो तो मैं कहूंगा— Mirzapur The Movie में भौकाल अभी वैसा ही है, बस उसे थोड़ा कम समय में दिखाया जाता तो मजा और बढ़ जाता। पंकज त्रिपाठी का कालीन भैया वाला करैक्टर, दिव्येंदु की Munna Bhaiya वाली energy, अली फजल का Guddu वाला अंदाज और रवि किशन का अंदाज फिल्म को देखने की वजह देते हैं।

एक्शन और डॉयलोग्स बड़े पर्दे पर अच्छे लगते हैं और पुराने किरदारों की वापसी कुछ अच्छे मूमेंट्स भी देती है। वहीं दूसरी तरफ लंबी रन टाइम और कुछ धीमे हिस्से फिल्म को पूरी तरह शानदार बनने से रोकते हैं। मेरे लिए यह एक ऐसी फिल्म है जो मिर्जापुर के फैंस को ज्यादा पसंद आएगी, जबकि नए दर्शकों के लिए इसका असर उतना मजबूत नहीं होगा।